इसबिहार से सामने आई एक चौंकाने वाली इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट ने पूरे देश को हैरान कर दिया है।
इस खुलासे के मुताबिक, श्मशान घाटों में दाह संस्कार के बाद बचने वाले कोयले का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर अगरबत्ती बनाने में किया जा रहा है। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं बल्कि करीब 1000 करोड़ रुपये का बड़ा कारोबार बन चुका है, जिसकी सप्लाई बिहार से निकलकर कई राज्यों तक पहुंच रही है।
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** श्मशान से शुरू होती है सप्लाई चेन**
इस पूरे नेटवर्क की शुरुआत श्मशान घाटों से होती है। जब किसी शव का दाह संस्कार किया जाता है, तो लकड़ी पूरी तरह नहीं जलती और अधजला कोयला बच जाता है। चिता ठंडी होने के बाद मजदूर चोरी-छिपे इस कोयले को इकट्ठा करते हैं। यही कोयला आगे पूरे कारोबार की नींव बनता है।
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**🚚 एजेंट्स और नेटवर्क: हर स्तर पर फैला धंधा**
जांच में सामने आया कि इस काम के लिए एक पूरा सिंडिकेट काम कर रहा है। स्थानीय एजेंट मजदूरों से कोयला खरीदते हैं और अलग-अलग श्मशानों से इसे इकट्ठा करते हैं। इसके बाद इसे बड़े व्यापारियों और फैक्ट्रियों तक पहुंचाया जाता है। सप्लाई के लिए अलग-अलग गाड़ियां भी लगी होती हैं, जिससे यह नेटवर्क बिना रुकावट चलता रहता है।
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**🏭 होटल से लेकर अगरबत्ती फैक्ट्री तक इस्तेमाल**
भास्कर टीम ने होटल संचालक बनकर जब डील की, तो खुलासा हुआ कि इस कोयले का इस्तेमाल सिर्फ अगरबत्ती में ही नहीं बल्कि होटलों और बिस्किट फैक्ट्रियों में भी किया जा रहा है। बड़े कोयले को होटल में खाना बनाने के लिए और छोटे कोयले व राख को अगरबत्ती बनाने में भेज दिया जाता है।

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**🧪 कैसे बनती है श्मशान के कोयले से अगरबत्ती**
अगरबत्ती बनाने की प्रक्रिया भी बेहद चौंकाने वाली है। कोयले को मशीन में डालकर बारीक पाउडर बना दिया जाता है। इस दौरान अगर उसमें हड्डियों के टुकड़े भी हों, तो वे भी पूरी तरह पीसकर पाउडर में बदल जाते हैं। इसके बाद इसमें लकड़ी का बुरादा और केमिकल मिलाकर अगरबत्ती तैयार की जाती है।
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**🌸 खुशबू से छिपाई जाती है सच्चाई**
एजेंट्स का कहना है कि अगरबत्ती में इतनी तेज खुशबू (जैसे गुलाब, चंदन, केवड़ा) मिलाई जाती है कि किसी तरह की बदबू महसूस नहीं होती। यहां तक कि अगर हड्डियों का अंश भी मौजूद हो, तो भी उसकी पहचान नहीं हो पाती। यह बात उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ा झटका है।
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**📍 कई जिलों में फैला नेटवर्क, गयाजी बना हब**
जांच के दौरान पटना, गया, नालंदा, वैशाली समेत कई जिलों में यह नेटवर्क सक्रिय मिला। खासकर गयाजी और उसके आसपास के इलाकों में अगरबत्ती बनाने की बड़ी संख्या में फैक्ट्रियां पाई गईं। यहां हर गांव में 3-4 फैक्ट्रियां तक काम कर रही हैं और बड़े स्तर पर उत्पादन हो रहा है।

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**👥 संगठित टीम और काम का तरीका**
इस धंधे में अकेले लोग नहीं बल्कि पूरी टीम काम करती है। उदाहरण के तौर पर, एक एजेंट के साथ 10-12 लोगों की टीम होती है, जिसमें कुछ लोग कोयला निकालते हैं और कुछ सप्लाई का काम संभालते हैं। कोयला निकालने का काम तब किया जाता है जब शव पूरी तरह ठंडा हो जाता है, ताकि किसी को शक न हो।
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🧑💼 एजेंट ‘बिट्टू’ का खुलासा: सब कुछ मिक्स, सब कुछ बिकता है
पटना के बांस घाट पर रिपोर्टर की मुलाकात एजेंट बिट्टू से हुई। बातचीत में बिट्टू ने खुलकर बताया कि श्मशान का कोई भी हिस्सा बेकार नहीं जाता। बड़ा कोयला होटलों में जाता है और छोटा कोयला व राख अगरबत्ती फैक्ट्रियों में भेजी जाती है।
जब रिपोर्टर ने पूछा कि अगर कोयले में हड्डियां हों तो क्या होगा, तो बिट्टू ने कहा कि मशीन में पीसने के बाद सब पाउडर बन जाता है और पहचान नहीं होती। उसने यह भी बताया कि सेंट (खुशबू) डालने से किसी तरह की बदबू नहीं आती। यानी उपभोक्ता यह पहचान ही नहीं सकता कि अगरबत्ती किस चीज से बनी है।
🚚 रामजीवन का दावा: बिहार से बाहर भी जा रहा माल
बिट्टू के जरिए रिपोर्टर की मुलाकात रामजीवन ठाकुर से हुई, जिसने इस नेटवर्क के बड़े स्तर का खुलासा किया। रामजीवन ने बताया कि यह कोयला सिर्फ बिहार में ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी सप्लाई किया जा रहा है।
उसने कहा कि गयाजी में बड़ी संख्या में अगरबत्ती फैक्ट्रियां हैं, जहां इसी कोयले का इस्तेमाल होता है। वहां मशीनों से कोयले को पीसकर पाउडर बनाया जाता है और फिर अगरबत्ती तैयार की जाती है। गंध को खत्म करने के लिए केमिकल और परफ्यूम मिलाए जाते हैं।
📍 गयाजी में ‘अखिलेश’ से डील: टीमवर्क और प्लानिंग
रिपोर्टर गयाजी के श्मशान घाट पहुंचा, जहां उसकी मुलाकात अखिलेश से हुई। शुरुआत में अखिलेश सावधान था, लेकिन बाद में उसने पूरी डील पर बातचीत की।
अखिलेश ने बताया कि उसके साथ 10-12 लोगों की टीम काम करती है। इसमें कुछ लोग चिता से कोयला निकालते हैं और कुछ उसकी सप्लाई करते हैं। यह काम शव ठंडा होने के बाद किया जाता है, ताकि किसी को शक न हो।
जब रिपोर्टर ने हड्डियों को लेकर सवाल किया, तो अखिलेश ने साफ कहा कि मशीन में सब कुछ पाउडर बन जाता है, जिससे पहचान नहीं हो पाती। उसने यह भी भरोसा दिलाया कि जरूरत के हिसाब से जितना चाहें उतना कोयला उपलब्ध कराया जा सकता है।
🏭 तेजामुल की फैक्ट्री: कैसे बनती है अगरबत्ती
गयाजी के पास लक्ष्मीपुर में रिपोर्टर की मुलाकात अगरबत्ती फैक्ट्री चलाने वाले तेजामुल से हुई। यहां रिपोर्टर ने नई फैक्ट्री खोलने की बात कहकर पूरी प्रक्रिया समझी।
तेजामुल ने बताया कि अगरबत्ती बनाने में बांस की काठी, कोयले का पाउडर और लकड़ी का बुरादा इस्तेमाल होता है। कोयले का पाउडर लोकल स्तर पर ही मिलता है, जिसे पहले मशीन से पीसा जाता है और फिर चलनी से छाना जाता है।
जब रिपोर्टर ने हड्डियों के टुकड़ों को लेकर चिंता जताई, तो तेजामुल ने कहा कि सब कुछ अच्छी तरह छान लिया जाता है। हालांकि उसने यह भी माना कि कभी-कभी मशीन में पीसने के बाद छोटे कण इधर-उधर रह सकते हैं।

⚙️ क्रशर मशीन: सबूत मिटाने का तरीका
इस पूरे सिस्टम में क्रशर मशीन की अहम भूमिका है। कोयले को इतनी बारीकी से पीसा जाता है कि उसमें मौजूद हड्डियों के अंश भी पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। तैयार पाउडर को बाजार में सस्ते दाम (करीब 17 रुपये प्रति किलो) में बेचा जाता है, जिससे फैक्ट्रियों को सस्ता कच्चा माल मिल जाता है।
📦 पूरा नेटवर्क कैसे काम करता है (स्टेप-बाय-स्टेप)
दाह संस्कार के बाद अधजला कोयला बचता है
चिता ठंडी होने पर मजदूर इसे इकट्ठा करते हैं
स्थानीय एजेंट इसे खरीदते हैं
अलग-अलग श्मशानों से कोयला इकट्ठा होता है
प्रोसेसिंग में हड्डियां और राख अलग की जाती हैं
मशीन से पीसकर पाउडर बनाया जाता है
फैक्ट्रियों में भेजकर अगरबत्ती बनाई जाती है
💰 करोड़ों का कारोबार और 5 राज्यों में सप्लाई
इस पूरे नेटवर्क ने एक बड़े कारोबार का रूप ले लिया है। बिहार में ही इसका कारोबार 800 से 1500 करोड़ रुपये तक बताया जा रहा है, जबकि देशभर में अगरबत्ती का कुल बाजार 10-12 हजार करोड़ रुपये का है। यहां बनी अगरबत्तियां कई राज्यों में सप्लाई हो रही हैं।
⚠️आस्था और सेहत पर बड़ा सवाल
इस खुलासे ने लोगों की धार्मिक आस्था और स्वास्थ्य दोनों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना जानकारी के लोग ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो श्मशान के अवशेषों से बने हो सकते हैं।
🌿सुरक्षित विकल्प क्या हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को प्राकृतिक विकल्प जैसे गाय के गोबर, फूलों या हर्बल सामग्री से बनी अगरबत्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे न सिर्फ सेहत सुरक्षित रहेगी बल्कि ऐसे विवादित उत्पादों से भी बचा जा सकता है।
📢निष्कर्ष: परत-दर-परत खुलती सच्चाई
यह मामला सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि एक संगठित नेटवर्क का खुलासा है, जिसमें श्मशान से लेकर फैक्ट्री तक कई लोग जुड़े हुए हैं। रिपोर्टर द्वारा की गई बातचीत से यह साफ हो जाता है कि यह काम पूरी प्लानिंग और सिस्टम के साथ चल रहा है। अब जरूरत है सख्त कार्रवाई और जागरूकता की, ताकि इस तरह के धंधों पर रोक लगाई जा सके।
**⚙️ क्रशर मशीन से बनता है फाइनल पाउडर**
जांच में यह भी सामने आया कि कोयले को बारीक करने के लिए क्रशर मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। इस मशीन में इतना दबाव होता है कि कोयले के साथ मौजूद हड्डियों के टुकड़े भी पूरी तरह पिस जाते हैं। तैयार पाउडर को लगभग 17 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता है।

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**📦 5 राज्यों तक सप्लाई, करोड़ों का कारोबार**
बिहार में बना यह प्रोडक्ट अब उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में सप्लाई किया जा रहा है। देश में अगरबत्ती का कुल कारोबार 10-12 हजार करोड़ रुपये का है, जिसमें बिहार का हिस्सा 800 से 1500 करोड़ रुपये तक बताया जा रहा है।
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**⚠️ आस्था और सेहत दोनों से खिलवाड़**
इस पूरे मामले ने लोगों की धार्मिक भावनाओं और स्वास्थ्य दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिना जानकारी के लोग ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो श्मशान के अवशेषों से बने हैं। विशेषज्ञ इसे गंभीर मुद्दा मानते हैं और इससे बचने की सलाह देते हैं।
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**🌿 विकल्प क्या है?**
विशेषज्ञों का सुझाव है कि लोगों को गाय के गोबर, फूलों या प्राकृतिक सामग्री से बनी धूप और अगरबत्ती का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे न सिर्फ पर्यावरण सुरक्षित रहेगा बल्कि इस तरह के विवादित उत्पादों से भी बचाव होगा।
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**📢 निष्कर्ष: बड़ा खुलासा, बड़ा सवाल**
बिहार से सामने आया यह मामला सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। जहां एक ओर यह कारोबार तेजी से बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या मुनाफे के लिए आस्था और नैतिकता को इस हद तक नजरअंदाज किया जा सकता है?
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